(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.146. अध्यायः 146
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कपोतस्य वह्निप्रवेशदर्शिना व्याधेन आत्मोपालम्भपूर्वकं स्वप्राणविमोक्षणायानशनादिना शरीरशोषणाध्यवसायः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-146-0x(5786)(70867)
ततः स लुब्धकः पश्यन्क्षुधयाऽपि परिप्लुतः।
कपोतमग्निपतितं वाक्यं पुनरुवाच ह॥ 12-146-1(70868)
किमीदृशं नृशंसेन मया कृतमबुद्धिना।
भविष्यति हि मे नित्यं पातकं भुवि जीवतः।
स विनिन्दंस्तथाऽऽत्मानं पुनः पुनरुवाच ह॥ 12-146-2(70869)
धिङ्भामस्तु सुदुर्बुद्धिं सदा निकृतिनिश्चयम्।
शुभं कर्म परित्यज्य सोऽहं शकुनिलुब्धकः॥ 12-146-3(70870)
नृशंसस्य ममाद्यायं प्रत्यादेशो न संशयः।
दत्तः स्वमांसं दहता कपोतेन महात्मना॥ 12-146-4(70871)
सोहं त्यक्ष्ये प्रियान्प्राणान्पुत्रान्दारान्विसृज्य च।
उपदिष्टो हि मे धर्मः कपोतेनात्र धर्मिणा॥ 12-146-5(70872)
अद्यप्रभुति देहं स्वं सर्वभोगैर्विवर्जितम्।
यथा स्वल्पं सरो ग्रीष्मे शोषयिष्याम्महं तथा॥ 12-146-6(70873)
क्षुत्पिपासातपसहः कृशो ध्रमनिसन्ततः।
उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये पारलौकिकम्॥ 12-146-7(70874)
अहो देहप्रदानेन दर्शिताऽतिथिपूजना।
तस्माद्धर्मं चरिष्यामि धर्मो हि परमा गतिः॥ 12-146-8(70875)
दृष्टो धर्मो हि धर्मिष्ठे यादृशो विहगोत्तमे।
एवमुक्त्वा विनिश्चित्य रौद्रकर्मा स लुब्धकः॥ 12-146-9(70876)
महाप्रस्थानमाश्रित्य प्रययौ संशितव्रतः॥ 12-146-10(70877)
ततो यष्टिं शलाकां च धारकं पञ्जरं तथा।
तां च बद्धां कपोतीं स प्रमुच्य विससर्ज ह॥ ॥ 12-146-11(70878)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 146॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-146-4 प्रत्यादेशः धिक्कारपूर्वक उपदेशः॥


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